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बहुभागीय पुस्तकें >> युद्ध - भाग 1

युद्ध - भाग 1

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :344
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2863
आईएसबीएन :81-8143-196-0

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राम कथा पर आधारित उपन्यास

चौबीस

 

हनुमान और विभीषण सीता को लेकर आए थे। उनके साथ सरमा और कला भी थीं। पीछे-पीछे त्रिजटा भी आई थी। सीता कक्ष से बाहर निकली तो मुख्य द्वार पर स्वयं राम उनके स्वागत के लिए उपस्थिति थे। सीता की कृश काया को पहचानने के लिए कुछ प्रयास करना पड़ा था; किंतु तनिक-सा ध्यान देने पर उस सूखी काया में से सीता को पहचान लेना तनिक भी कठिन नहीं था। राम ने देखा : उनकी सीता वियोगिनी रूप में उनके सम्मुख खड़ी थीं। एक वेणी, सफेद सादी किंतु साफ धोती। आंखों में वेदना, सहनशीलता, और एक प्रकार की दृढ़ता का विचित्र मिश्रण। किंतु राम प्रसन्न थे, इतनी यातना के बाद भी सीता के चेहरे पर दीनता अथवा याचना नहीं थी...

"आओ सीते!" राम ने अपने हाथ बढ़ाए, "अपने राम से अब और दूर नहीं रहो। एक वर्ष की दीर्घ अग्नि-परीक्षा दी है तुमने। अब तुम्हें कुछ सुख भी मिलना चाहिए...।"

सीता को जैसे सहसा विश्वास ही नहीं हो रहा था...क्या सत्य ही हनुमान उन्हें खोजने आया था, राम सागर पार कर आए थे; क्या सत्य ही राक्षस सेना पराजित हुई थी और रावण मारा गया था?...हां! यह सब सत्य था। उनके राम अपनी बाहें फैलाए उनके सम्मुख खड़े थे। और क्या प्रमाण चाहिए उन्हें...

सीता ने आगे बढ़कर राम के हाथों में अपनी हथेलियां रख दीं। उन्होंने अपने प्रिय की आंखों में झांका। वहां प्रेम का अथाह सागर लहरा रहा था। इतने दिनों के वियोग, कठिन परीक्षाओं, रक्त-रंजित युद्धों ने उनके राम को तनिक भी नहीं बदला था।

राम ने सीता की आंखों में देखा, अब भी उन आंखों में वैसा ही

स्वच्छ, निर्दोष सम्मोहन था, जिस पर राम रीझते हुए नहीं थकते थे...।

अपने सहयोगियों से घिरे राम और सीता अपने स्कंधावार की ओर मुड़े। मार्ग के दोनों और श्रमिक सेनाओं, शिल्पी सेनाओं, सहायक सेनाओं, जन सेवाओं तथा किष्किंधा की नियमित सेनाओं के सैनिक खड़े थे। उनके चेहरों पर श्रम के बाद की थकान की तृप्ति और उल्लास था। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कोई-न-कोई सेनापति और यूथपति खड़ा अभिवादन कर रहा था।

सीता देख रही थी : उनके राम वैसे ही थे, सीधे और सरल बनवासी! किंतु इस अपार जन-समूह तथा उनके नेताओं की आंखों में जो भाव था, वह राम को कहीं विचलित न कर दे। राम चाहे अपने मन में न लाएं, किंतु इन लोगों की दृष्टियां उन्हें बार-बार कहेंगी, बार-बार जताएगी कि वे असाधारण हैं, वे उच्च हैं, वे विशिष्ट हैं जन-सामान्य अपनी सरलता मैं जो श्रद्धा और प्यार देता है, वह किसी भी व्यक्ति को उन्मादी बना सकता है...। पर राम में महानता का जितना तत्व होगा, वह उस उन्माद का प्रतिरोध करेगा...

"देवर उग्रदेव कहां हैं?" सहसा सीता ने पूछा।

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    अनुक्रम

  1. एक
  2. दो
  3. तीन
  4. चार
  5. पांच
  6. छह
  7. सात
  8. आठ
  9. नौ
  10. दस
  11. ग्यारह
  12. तेरह
  13. चौदह
  14. पन्द्रह
  15. सोलह
  16. सत्रह
  17. अठारह
  18. उन्नीस
  19. बीस
  20. इक्कीस
  21. बाईस
  22. तेईस
  23. चौबीस

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